
अनुसूचित जनजाति उपयोजना अंतर्गत कृषक संगोष्ठी का आयोजन –
भाकृअप – राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान द्वारा प्रायोजित अनुसूचित जनजाति उपयोजना के अंतर्गत वित्तपोषित ग्रामीण उद्यमिता के लिए मुर्गीपालन विषय पर कृषक संगोष्ठी का आयोजन कृषि विज्ञान केंद्र, डिंडोरी द्वारा जिले के विभिन्न ग्रामों में आयोजित किया जा रहा है।
कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ के.के. देशमुख ने बताया कि ग्रामीण अंचल में स्वरोजगार को बढ़ावा देने तथा किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने के उद्देश्य से मुर्गीपालन पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन जिले के विभिन्न ग्रामों में किया जा रहा है। कार्यक्रम में आसपास के गांवों से आए किसानों, युवाओं एवं महिला स्व-सहायता समूहों की उत्साहजनक सहभागिता देखने को मिली।
प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ पी. एल. अंबुलकर द्वारा मुर्गीपालन की आधुनिक एवं वैज्ञानिक पद्धतियों पर विस्तार से जानकारी दी। इसमें उन्नत नस्लों का चयन, चूजों की उचित देखभाल, संतुलित आहार प्रबंधन, समय पर टीकाकरण, रोगों की पहचान एवं रोकथाम, स्वच्छता प्रबंधन तथा बाजार से जुड़ाव जैसे महत्वपूर्ण विषयों को सरल भाषा में समझाया गया।
कार्यक्रम के नोडल अधिकारी अवधेश पटेल ने बताया की यह प्रशिक्षण कार्यक्रम जिले के अनुसूचित जनजाति बाहुल्य ग्रामों रयपुरा, चंद्रागढ़, चटिया, पड़रिया, फड़की आदि ग्रामों में आयोजित कर लगभग 200 कृषकों और महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया है और अनुसूचित जनजाति वर्ग के परिवारों के उत्थान के लिए 20 परिवारों को चूजे, केज, मुर्गीदाना एवं अन्य सामग्री के साथ साथ तकनीकी जानकारी भी प्रदान की जा रही है।
कु श्वेता मसराम ने बताया कि मुर्गीपालन कम पूंजी में शुरू होने वाला लाभकारी व्यवसाय है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर सृजित हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से मुर्गीपालन करें तो कम समय में अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को व्यावहारिक जानकारी भी दी गई, जिससे वे अपने स्तर पर इस व्यवसाय को सफलतापूर्वक शुरू कर सकें।
कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि सरकार द्वारा मुर्गीपालन को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं, जिनका लाभ उठाकर किसान अपनी आय बढ़ा सकते हैं। वैज्ञानिकों ने युवाओं से आह्वान किया कि वे पारंपरिक खेती के साथ-साथ सहायक व्यवसाय के रूप में मुर्गीपालन को अपनाएं, जिससे आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाया जा सके।
प्रशिक्षण में शामिल प्रतिभागियों ने कार्यक्रम को अत्यंत उपयोगी बताते हुए कहा कि इससे उन्हें मुर्गीपालन की बारीकियों को समझने का अवसर मिला है। उन्होंने भविष्य में इस प्रकार के और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की मांग भी रखी।
कार्यक्रम के अंत में वैज्ञानिकों के द्वारा सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया गया तथा प्रशिक्षण सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।










