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सरहद पार से आई यह मिठाई खंडवा में होली पर बनी आकर्षण का केंद्र

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सरहद पार से आई यह मिठाई खंडवा में होली पर बनी आकर्षण का केंद्र

होली पर्व पर गीहर मिठाई खरीदने के लिए दुकानों पर लगी भीड़।

खंडवा।आजादी क़े बाद 1947 में जब देश विभाजन हुआ था तब भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के समय पाकिस्तान से भारत आई एक खास मिठाई गीहर आज 79 वर्षों बाद भी लोगों को आकर्षित कर रही है। यह खास व्यंजन जिसकी मिठास होली के त्योहार पर ही घर घर से जब आती है तब लोग इसके स्वाद की मदहोशी में खो जाने और व्यंजन का लुत्फ उठाने बधाई के बहाने अपने लोगो क़े बीच खींचे चले आते हैं।
समाजसेवी सुनील जैन ने बताया कि 79 वर्षों बाद भी सिंधी मिठाई गीहर सिंधी समाज के साथ अन्य लोगों की भी पसंदीदा बनी हुई है। सिंधी समाज के लोग इस मिठाई को बहन बेटियों एवं अपने परिजनों को भी होली पर भेजते है और यह एक पखवाड़ा तक खराब भी नहीं होती है।
सुनील जैन ने बताया कि मामला क्रिकेट में पाकिस्तान क़े साथ हाथ नहीं मिलाने की अदावत का हो या पाकिस्तान और भारत के बीच रिश्तों में पीढ़ीयों की तल्खी हो लेकिन सिंध नदी पार से आई एक सिंधी मिठाई भारत में रिश्तों में मिठास घोल रही है। हर साल की तरह खंडवा की सिंधी कॉलोनी में होली के सप्ताह भर पहले से क्षेत्र की अलग अलग दुकानों पर लोगों की भीड़ मिठाई की खरीददारी के लिए हर रोज उमड़ रही है।जहां पर लोग मिठाई को अपने परिवार की बहन बेटियों को भी वितरित करते हैं।इसमें सबसे खास बात यह है कि यह मिठाई सिर्फ होली के त्योहार पर ही बनाई जाती है।सिंधी समाज से जुड़े हजारों परिवार के लोग इस मिठाई को बड़ी तादाद में खरीदते हैं।सिंधी समाज के बीच कई दशकों से इस मिठाई का स्वाद हर बार नए नए लोगों को अपनी और आकर्षित करती है।सिंधी समाज के अलावा अन्य समाज के लोग भी अब इस मिठाई की खुशबू और इसके स्वाद को भी जानने लगे हैं। लिहाजा दूसरे समाज के लोग भी इसे पसंद करने लगे हैं।

मिठाई का खास ठिकाना सिंधी बाजार

सुनील जैन ने बताया कि खंडवा में लोकप्रिय सिंधी कॉलोनी में सिंधी बाजार में इस खास सिंधी मिठाई क्विंटल में खरीदने वाले शहर में बड़े व्यापारी अनिल आरतानी ने बताया कि पाकिस्तान के बंटवारे के समय सिंधी समाज के लोग जब पाकिस्तान से भारत आए थे, तब मिठाई की परंपरा सिंधी घियर भी उनके साथ भारत आ गई। परंपराएं, मान्यताएं हर पीढ़ियों में बदलती चली गई, टूटती गई लेकिन होली के त्योहार पर इस मिठाई का विशेष महत्व है वह कई दशकों बाद भी आज विद्यमान है।पाकिस्तान से भारत आए सिंधी परिवार ने इसका निर्वहन बखूबी किया। तभी यह कई पीढियां में रचा और बसा हुआ है।

हर रोज 15 क्विटल खपत होती है घियर

खंडवा के सिंधी बाजार में इस गीहर की इतनी ज्यादा मांग है कि सुनकर आपका भी होश फाख्ता हो जाएंगे।हर रोज लगभग 15 क्विंटल गीहर की खपत इन दिनों हो रही है। जिसे बनाने के लिए अलग-अलग कारीगर अलग-अलग दुकानों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। खंडवा की हीरा स्वीट्स पर पिछले 46 वर्षों से कारीगर के रूप में अपनी सेवाएं देने वाले मोहन जगताप का कहना है कि लोगों के होंठ और जुबान पर हमेशा इसकी रस की मिठास ने इन्हें नई ताकत दी है।

आखिर कैसे बनता है यह पकवान

आखिरकार यह पकवान कैसे बनता है यह सवाल सब की जुबान पर सवाल के रूप में घुमडता रहता है।हम आपको बताते हैं आखिर यह पकवान बनता कैसे है।
कारीगरों ने बताया कि जलेबी की तरह दिखने वाली इस मिठाई को तैयार करने के लिए मैदा, दूध और केसर का घोल बनाकर दो दिनों तक खटास आने तक रख दी जाती है। दो दिनों बाद शुद्ध घी में इसे छाना जाता है। हर दुकानदार द्वारा बनाने के तरीके अलग-अलग है लेकिन स्वाद सब में एक ही है।

15 दिनों तक खराब नहीं होती है यह मिठाई

आज के दौर में नए दोस्तों में भले ही दोस्ती का रिश्ता सप्ताह भर भी ना चले लेकिन इस मिठाई की खासियत यह है कि यह एक बार तैयार हो जाने के बाद 15 दिनों से ज्यादा समय तक या खराब नहीं होती। शुद्ध घी से बनने के कारण इसे लोग अपने रिश्तेदारों को गिफ्ट के तौर पर देने के लिए लंबे समय तक बचा के रखते हैं ताकि रिश्तों की मर्यादा भी बनी रहे।

400 रु किलो से लेकर 800 रु किलो तक बिकती है यह मिठाई

समाज के प्रवक्ता कमल नागपाल ने बताया कि खंडवा की सिंधी कॉलोनी में बिकने वाली यह मिठाई हर वर्ग के लोगों के लिए अलग अलग शहरों में अलग-अलग कीमत लिए बिकती है।निम्न वर्ग हो या उच्च वर्ग हो कोई भी निराश नहीं लौटता है।क्योंकि सब वर्ग के लिए महंगाई के इस जमाने में भी अत्यंत वाजिब दामों में यह व्यंजन दुकान में बेचने के लिए तैयार किया जाता है।शुद्ध घी से बनने वाली इस मिठाई के लिए लोगों को जेब थोड़ी ज्यादा ढीली करनी पड़ती है, वहीं तेल या डालडा में बनी मिठाई के लिए कम मूल्य चुकाना पड़ता है। लेकिन सभी मिठाइयों की मिठास एक जैसी होती है भले ही पाकिस्तान से हमारे रिश्तो में खटास हो।इस वर्ष यह मिठाई 240 रुपए किलो के दाम से खंडवा में बिक्री हेतु उपलब्ध है।कमल नागपाल ने बताया कि इस मिठाई के बिना होली पर्व की मिठास अधूरी मानी जाती है।इसको खरीदने के लिए लोग काफी देर तक कतार में लगकर खरीदी करते हैं।रंगपंचमी तक इसकी धूम बनी रहेगी।

ड्राई फ्रूट वाले मीठे समोसे भी खरीदे जाते हैं

गीहर बनाने वाले व्यवसाई लक्की दुल्हानी ने बताया कि समाज की मांग पर कई दिन पहले से विशेष तैयारी की जाती है।बाहर भेजने के लिए आकर्षक बॉक्स और डिब्बे में भी मिठाई दी जाती है।इसी के साथ ही ड्राई फ्रूट वाले मीठे समोसे भी होली पर खरीद कर बहन बेटियों को भेजे जाते हैं।

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