
तीर्थोदय का शाही पंच कल्याणक – मनो धरती पर उतरा हुआ स्वर
तीर्थोदय के शाही पंच कल्याणक में अब पूरे शानो-शौकत और वैभवशाली वैभव के साथ अपने दिव्य चरण में प्रवेश कर लिया गया है। जैसे ही जगत पूज्य गुरुदेव के पावन दर्शन से यह भूमि धन्य हुई, वैसे ही विशिष्ट हुआ मानो स्वयं जगत ने आकाश से पुष्पवृष्टि कर इस महोत्सव का स्वागत किया हो। प्रदीप जी सुयश के मुखारविंद से होने वाले मंत्रोच्चार और अनुष्ठानों की गूंज अब केवल दिशाओं में नहीं, बल्कि हर श्वास के हृदय में प्रतिध्वनि हो रही है। वह नाद ऐसा है जैसे शंखनाद से जाग उठा हो सोया हुआ स्वर।
इन तीर्थयात्रियों में तीर्थोदय की धरती साधारण भूमि नहीं रह गई है, यह तो मानो स्वर्ग की धार्मिक संस्था है, जहां हर कदम पर श्रद्धा दीपक की तरह जल रह रहा है और हर सांस में भक्ति की सुगंध फैली हुई है। क्षेत्र के मध्य में स्थित भव्य जिनालय तो ऐतिहासिक स्वर्ण मंदिर की भव्यता का प्रतीक है – जैसे किसी कलाकार ने श्रद्धा, उपहार और सौंदर्य को मिश्रित करके एक ही प्रतिमा में ढाल दिया हो। उसकी आहा ऐसी है कि सूर्य भी अपनी किरणों की तरह आर्द्र से निहत्था हो रहा है।
पंच कल्याणक का यह पर्व केवल एक आयोजन नहीं है, यह तो आत्मा के संस्कारों का पुनर्जन्म है। यहां हर दृश्य उपदेश है, हर स्वर साधना है और हर भीड़ में एक अद्भुत शांति का साम्राज्य है। ऐसा अनोखा होता है मनो समय स्वयं राज्यकर इस महोत्सव के दर्शन कर रहे हो, और इतिहास अपने स्वर्णिम प्रवेश में इस क्षण को शामिल करने को आतुर हो

इन्द्र-इन्द्राणियों से सजा पंडाल और गुलाबी ठंड में भीगी भक्ति
इंद्र और इंद्राणियों से खचाखच भरा हुआ वह विशाल पंडाल इन दिनों किसी दिव्य दृश्य जैसा दिखता है, जहां हर ओर श्रद्धा, सौंदर्य और संस्कार एक साथ मुस्कुरा रहे हैं। रंग-बिरंगे वस्त्रों में सजे पात्र ऐसे शामिल हैं जैसे मानो स्वर्ग की झांकी धरती पर उतरती हो और देवताओं ने स्वयं इस पंच कल्याणक की शोभा बढ़ाने का संकल्प लिया हो।
ऊपर से आकाश की ओर देखो तो गुलाबी ठंड के फूल-हल्की फुहारें जैसे फूलों की पौध की तरह गिरती दिखती हैं, जो मौसम को भी खुशनुमा बना रही हैं और माहौल बेहद प्रिय, मधुर और आत्मीय है। वह ठंड जो आम दिनों में कंपनी कंपनी बन जाती है, यहां भक्ति की ऊर्जा से स्नेहिल अलिंगन में बदल दिया गया है।
ऐसे माहौल में शामिल हैं मंत्रोच्चार सिद्धांत, नेत्रों से दिव्य दृश्य और हृदय से श्रद्धा निद्रा करना – यह अनुभव शब्दों से नहीं, केवल भावना से समझा जा सकता है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि जो भी अभी तक इस महोत्सव के दर्शन नहीं कर पाए हैं, उन्हें एक बार यहां इस अलौकिक अनुभूति का साक्ष्य मिलना चाहिए, क्योंकि कुछ दृश्य जीवन में पुण्य आते हैं और यह पंच कल्याणक जीन दुर्लभ स्केच में से एक है।
निश्चित ही, तीर्थोदय का यह शाही पंच कल्याणक आने वाली समाधि के लिए भी आस्था, प्रेरणा और गौरव की अमित खड़िया स्मृतियों में अंकित रहें।












