
DIndori | ऑटो डेस्क
रात के समय ड्राइविंग अब पहले से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गई है। सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों में लगी अत्यधिक चमकदार व्हाइट LED और HID लाइट्स न केवल सामने से आ रहे चालकों की आंखों को चुंधिया रही हैं, बल्कि जानलेवा सड़क हादसों का मुख्य कारण भी बन रही हैं।
‘स्नो ब्लाइंडनेस’ जैसा अनुभव
विशेषज्ञों का कहना है कि गाड़ियों में आफ्टर-मार्केट (बाहर से लगवाई गई) व्हाइट लाइट्स से निकलने वाली तेज रोशनी सामने वाले ड्राइवर की आंखों के सामने ‘ब्लैकआउट’ पैदा कर देती है। इसे तकनीकी भाषा में ‘ग्लेयर’ (Glare) कहा जाता है।
- अस्थायी अंधापन: तेज व्हाइट लाइट के संपर्क में आते ही ड्राइवर को कुछ सेकंड के लिए दिखना बंद हो जाता है।
- प्रतिक्रिया समय में कमी: रोशनी की वजह से सामने वाले व्यक्ति को सड़क के गड्ढे या मोड़ दिखाई नहीं देते, जिससे दुर्घटना की संभावना 40% तक बढ़ जाती है।
पीली लाइट बनाम व्हाइट लाइट
पुराने समय की ‘हैलोजन’ (पीली) लाइट धुंध और बारिश में बेहतर विजिबिलिटी देती थी। इसके विपरीत, सफेद रोशनी हवा के कणों से टकराकर फैल जाती है, जिससे चलाने वाले को तो कम दिखता ही है, सामने वाले के लिए भी यह ‘विजुअल टॉर्चर’ बन जाता है।
क्या कहता है कानून? (Motor Vehicle Act)
भारत के केंद्रीय मोटर वाहन नियमों के अनुसार:
- गाड़ियों में कंपनी द्वारा फिट की गई लाइट के मानकों से छेड़छाड़ करना गैरकानूनी है।
- अत्यधिक तेज और बिना ढकी (unmasked) हेडलाइट्स के इस्तेमाल पर भारी जुर्माने का प्रावधान है।
- शहर के भीतर ‘हाई-बीम’ का उपयोग प्रतिबंधित है, फिर भी लोग व्हाइट लाइट को फुल बीम पर रखते हैं।
नेत्र विशेषज्ञों की चेतावनी
डॉक्टरों के अनुसार, रात में लगातार इन तेज रोशनी के संपर्क में आने से ड्राइवरों में सिरदर्द, आंखों में सूखापन और ‘नाइट विजन’ की कमी जैसी समस्याएं हो रही हैं।
एक पीड़ित की आपबीती: “सामने वाली गाड़ी की सफेद लाइट इतनी तेज होती है कि सड़क पर पैदल चल रहा इंसान या जानवर बिल्कुल दिखाई नहीं देता। ऐसा लगता है जैसे किसी ने आंखों में सीधा टॉर्च मार दिया हो। इसलिए डिंडोरी में भी ऐसी लाइटों पर चालान होना चाहिए
हमारा सुझाव: जिम्मेदार नागरिक बनें। अपनी गाड़ी की हेडलाइट को ‘लो-बीम’ पर रखें और यदि संभव हो तो कंपनी द्वारा निर्धारित स्टैंडर्ड लाइट्स का ही प्रयोग करें।












