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ऑनलाइन गेमिंग तो बैन, हमारा करोड़ों का कर्ज कौन चुकाएगा:विक्टिम बोले- पहले कहां थी सरकार; किसी का घर बिका तो किसी का धंधा चौपट दिल्ली

ऑनलाइन गेमिंग तो बैन, हमारा करोड़ों का कर्ज कौन चुकाएगा:विक्टिम बोले- पहले कहां थी सरकार; किसी का घर बिका तो किसी का धंधा चौपट दिल्ली

त्रिलोक न्यूज़ मध्य प्रदेश सहायक प्रमुख प्रवीण कुमार दुबे 8839125553

‘दोस्तों के कहने पर ऑनलाइन गेम खेलना शुरू किया था। पहले 10 हजार रुपए लगाए, 8 हजार का फायदा हुआ। फायदा हो रहा था, इसलिए बार-बार पैसे लगाने लगा। गेम खेलने की लत लग गई। फिर हारने लगा। हारे पैसे वापस पाने के लिए और पैसे लगाने लगा। पैसे तो वापस नहीं आए, मैं तीन करोड़ रुपए के कर्ज में डूब गया।’

महाराष्ट्र के संतोष गंगाशेट्टी कपड़ों का कारोबार करते थे। अच्छी कमाई थी। ऑनलाइन गेम्स के चक्कर में कर्जदार हो गए। मकान तक बेचना पड़ा। अब किराए के घर में रह रहे हैं। हमारा करोड़ों का कर्ज कौन चुकाएगा। ये कहानी सिर्फ संतोष की नहीं है। देश में लाखों लोग ऑनलाइन मनी गेमिंग की लत से जूझ रहे हैं।

ऑनलाइन मनी गेम्स पर रोक लगाने के लिए सरकार 22 अगस्त को नया कानून प्रमोशन एंड रेगुलेशन ऑफ ऑनलाइन गेमिंग लॉ, 2025 लाई है। अब कोई भी मनी बेस्ड गेम ऑफर करना, चलाना या उसका प्रमोशन करना गैरकानूनी है। ऐसा करने पर 3 साल तक की जेल और एक करोड़ रुपए तक का जुर्माना लग सकता है। हालांकि, गेम खेलने वालों को सजा नहीं होगी।

दैनिक भास्कर ने कुछ लोगों से बात की, जिन्हें ऑनलाइन मनी गेम्स की लत की वजह से काफी नुकसान उठाना पड़ा। मनी गेमिंग से मेंटल हेल्थ पर पड़ने वाले असर को भी जाना। इसके अलावा एक्सपर्ट से कानून के तकनीकी पहलू और खामियां भी समझीं।

सबसे पहले संतोष की आपबीती एक दिन में 7 लाख तक हारे, कर्ज चुकाने के लिए 51 लाख में मकान बेचा 59 साल के संतोष गंगाशेट्टी मुंबई से सटे भिवंडी में रहते हैं। जुलाई, 2022 में पहली बार ऑनलाइन गेम्स के बारे में पता चला। उन्होंने भिवंडी के एक सेंटर पर Funrep.net नाम की वेबसाइट पर गेम खेलना शुरू किया। शुरुआत में 10 हजार रुपए लगाए और 8 हजार रुपए का प्रॉफिट हुआ। सेंटर चलाने वाले लोग और पैसे लगाने पर उकसाने लगे।

संतोष कहते हैं, ‘तीन-चार दिन बाद मुझे नुकसान होने लगा। दिसंबर 2024 आते-आते मैं तीन करोड़ रुपए के कर्ज में डूब गया। एक दिन में 5-7 लाख रुपए तक हार गया। मेरा कपड़े का बड़ा बिजनेस था। रोज 3-4 लाख रुपए का पेमेंट आता था। गेमिंग में नुकसान हुए पैसों की रिकवरी के लिए और पैसे लगाता गया। इस दलदल में ऐसा फंसा कि जिंदगी तबाह हो गई।’

‘कर्ज चुकाने के लिए ज्वेलरी बेच दी। पूरा परिवार नाराज हो गया। किसी का सपोर्ट नहीं मिल रहा है। परेशान होकर सुसाइड करने की कोशिश भी की। कर्ज चुकाने के लिए 51 लाख में घर बेच दिया। अब भी मेरे ऊपर डेढ़ करोड़ का कर्ज है। कर्ज देने वाले परेशान कर रहे हैं।’

संतोष कहते हैं कि अब बस इस ट्रैप से निकलना है, सारा कर्ज चुकाना है ताकि परिवार पर कोई बोझ न आए।

अब झारखंड के पूरन साव की बात… दोस्त को जीतते देख लगी लत, 8 लाख हुआ कर्ज पूरन साव हजारीबाग जिले के रहने वाले हैं। 12 साल से अपने गांव गोरहर में इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान चला रहे हैं। मोबाइल और बाकी इलेक्ट्रॉनिक्स सामान की रिपेयरिंग करते हैं। कोविड में लॉकडाउन के दौरान उन्हें ऑनलाइन मनी गेमिंग का पता चला।

पूरन ने ‘तीन पत्ती’ गेम में किसी परिचित को 10 हजार रुपए जीतते देखा। इसके बाद उन्होंने भी पैसे लगाने शुरू कर दिए। शुरू में थोड़ा फायदा भी हुआ, लेकिन फिर हारने का सिलसिला शुरू हो गया। एक-एक दिन में 10 से 15 हजार रुपए हारने लगे। हारे हुए पैसे पाने की उम्मीद में वो और पैसे लगाते रहे। उन पर 8 लाख रुपए का कर्ज हो गया।

पूरन कहते हैं, ‘2021 में मेरे पास 6-7 लाख रुपए थे। मैंने पूरी रकम इसी में लगा दी। फिर दूसरों से भी ब्याज पर पैसे लिए और गेम में लगा दिए, ताकि हारे हुए पैसे वापस मिल जाएं। तीन-चार सालों में मैंने जितना कमाया था, सारा उसी में डूब गया। मेरे घर वालों को भी शक होने लगा कि मेरे साथ कुछ हुआ है।’

पूरन कहते हैं कि इस गेम के कारण उनका पूरा परिवार परेशान हो गया। वे कहते हैं, ‘कभी-कभी हम इसमें जीतते हैं। फिर हारने का सिलसिला शुरू होता है, तो पैसे गंवाते चले जाते हैं। कुछ नुकसान के बाद मैंने गेम खेलना छोड़ भी दिया था। फिर गंवाए पैसे वापस मिल जाएं, इस लालच में दोबारा डाउनलोड करके खेलने लगा।’

‘जब कर्ज का बोझ बढ़ा तो मैं परेशान रहने लगा। सब कुछ खत्म कर लेने का मन करता था। बस अपने परिवार को देखकर लगता था कि मेरा रहना जरूरी है।’

ऑनलाइन गेमिंग पर बने कानून को लेकर पूरन कहते हैं, ’ये सारे गेम फ्रॉड हैं। सरकार पहले कहां थी, पहले नजर क्यों नहीं गई? सरकार को पहले सिर्फ टैक्स से मतलब था। ये कानून पहले ही लाना चाहिए था। अगर पहले इस पर रोक लगती तो इतने परिवार बर्बाद नहीं होते। मैं कम से कम 5-6 लोगों को जानता हूं, जो ऑनलाइन गेमिंग में लाखों रुपए गंवा चुके हैं।’

ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों ने बंद किया कारोबार कानून में बैंकों को भी इस तरह के गेम्स के लिए ट्रांजैक्शन प्रोसेस रोकने को कहा गया है। यानी अब UPI और इस तरह के दूसरे एप्स से पैसे नहीं लगा पाएंगे। कानून आने के बाद गेमिंग कंपनियों ने रियल मनी गेम्स का कारोबार बंद करने का ऐलान किया। 22 अगस्त को ड्रीम11, My11Circle, विंजो, रियल11 जैसी कंपनियों ने अलग-अलग बयान जारी कर कहा कि वो कानून का पालन करेंगी और अपने प्लेटफॉर्म पर पैसे से खेले जाने वाले गेम्स बंद करेंगी।

हालांकि, इससे पहले ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े संगठनों जैसे ऑल इंडिया गेमिंग फेडरेशन (AIGF), ई-गेमिंग फेडरेशन (EGF) और फेडरेशन ऑफ इंडियन फैंटेसी स्पोर्ट्स (FIFS) ने विरोध जताया था। संगठन ने गृह मंत्री अमित शाह को चिट्ठी लिखकर कहा था कि बैन की जगह रेगुलेशन लाना चाहिए। उनका कहना था कि बैन से टैक्स दे रही लीगल कंपनियां बंद होंगी, जबकि गैरकानूनी ऑपरेटर्स इसका फायदा उठाएंगे।

नया कानून बनने के बाद भारत की गेमिंग कंपनियों ने एक नया संगठन बनाया है, जिसका नाम इंडियन गेम पब्लिशर्स एंड डेवलपर्स एसोसिएशन (IGPDA) है। इसका मकसद ई-गेमिंग को प्रमोट करना है और मेड-इन-इंडिया प्रोडक्ट्स को आगे बढ़ाना है। संगठन के मुताबिक,

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भारत में गेमिंग का मार्केट साढ़े आठ हजार करोड़ है। वहीं गेमिंग के जरिए 7 हजार करोड़ से ज्यादा विदेशी कंपनियों को पहुंच रहा है, जिनकी भारत में मौजूदगी नहीं है।

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एक्सपर्ट बोले… रियल मनी गेम्स के बदले ऑनलाइन गेम्स पर फोकस हो नए कानून पर सरकार ने कहा है कि इससे ई-स्पोर्ट्स और ऑनलाइन सोशल गेम्स को बढ़ावा मिलेगा। ऐसे गेम्स में पैसे लगाकर वापस पैसे मिलने का कोई नियम नहीं है। ये स्किल बेस्ड गेम्स माने जाते हैं और लोग इसे मनोरंजन के लिए खेलते हैं।

‘nCORE गेम्स’ के फाउंडर विशाल गोंडल नए कानून के समर्थक हैं। वे कहते हैं, ‘जैसे ही गेम्स के अंदर आपने सट्टेबाजी का एंगल जोड़ दिया, वो गेम नहीं रह जाता है। ये पूरी तरह जुए के एप्लिकेशंस बन गए थे। रमी, पोकर, तीन पत्ती जैसे गेम्स पर लोग पैसे लगाकर हार रहे थे। काफी देशों ने इन्हें बैन किया है, वहां ऐसे गेम्स को गैंबलिंग का दर्जा दिया गया है।‘

गोंडल कहते हैं कि इस तरह की कई कंपनियां बॉट (सॉफ्टवेयर) के जरिए आपको गेम खिला रही थीं। वे बताते हैं, ‘इस तरह के एप्स पर प्रोग्रामिंग होती है कि आप कितने गेम्स जीत सकते हैं और कितने हार सकते हैं। ये पूरा गेम सेट रहता था।‘

गोंडल कहते हैं कि भारत में जब सभी रियल मनी गेम्स में व्यस्त थे, तब असली गेमिंग इंडस्ट्री पर चीन ने कब्जा लिया। वे कहते हैं, ‘फ्री-फायर, पबजी, ये सारे गेम्स भारत में 6 से 7 हजार करोड़ का बिजनेस कर रहे हैं। भारत का एक भी ऑनलाइन गेम इनकी टक्कर में नहीं है। रियल मनी गेम्स के बदले हमें असली ऑनलाइन गेम्स पर फोकस करना चाहिए।।‘

इन मनी गेम्स का बचाव करने वाली कंपनियों का कहना है कि वे स्किल बेस्ड गेम्स चला रही हैं। वहीं कुछ एक्सपर्ट इस तरह के सख्त प्रतिबंध को सही नहीं मान रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार रेगुलेशन ला सकती थी।

बैन लगाना समाधान नहीं, अब लोग अवैध तरीके से खेलेंगे गेमिंग एक्सपर्ट और पब्लिक पॉलिसी कंसलटेंसी ग्रुप ‘KOAN एडवाइजरी’ की सीनियर एसोसिएट वेदिका पांडेय कहती हैं कि नए कानून से कोई समाधान नहीं निकल रहा है। उनके मुताबिक, ‘सरकार जो तर्क दे रही है कि लोगों को आर्थिक नुकसान हो रहा है या लत लग रही है। मेरे ख्याल से अब ये और ज्यादा बढ़ेगा।‘

‘इसका कारण है कि जब कोई भी चीज एडिक्टेड हो जाती है तो उसे बैन करके सही नहीं किया जा सकता है। इससे ये होगा कि जो डिमांड बनी थी, वो अंडरग्राउंड हो जाएगी। जैसे बिहार में शराबबंदी हुई, लेकिन लोगों ने दूसरी जगहें ढूंढ लीं और जहरीली शराब तक पी रहे हैं। ये मामला भी ऐसा ही है।‘

वेदिका कहती हैं कि भारत में ऑनलाइन गेमिंग का पूरा मार्केट 33 हजार करोड़ रुपए का है। वहीं 48 करोड़ लोग ऑनलाइन गेमिंग से किसी न किसी तरह जुड़े हुए हैं। सिर्फ ऑनलाइन रियल मनी गेम्स की बात करें तो 15.5 करोड़ यूजर्स हैं।

वेदिका का मानना है, ‘बॉट्स या कंपनियों की वैधता चेक करने के लिए रेगुलेशन बनाने चाहिए थे। यहां तो सरकार ने पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। अब यूजर्स अवैध तरीके से खेलना शुरू करेंगे।‘

कानून बनाने से पहले राज्य सरकार से सलाह लेनी चाहिए थी इस साल सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों को मिले नोटिस पर रोक लगा दी थी। फैंटेसी स्पोर्ट्स, पोकर और रमी स्किल गेम्स हैं या जुआ, इस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना अभी बाकी है। इसके अलावा इन कंपनियों पर लगने वाले टैक्स के मुद्दे पर भी फैसला आना है।

सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि कानून का मकसद सही है, लेकिन इसमें कोई डिटेल प्रावधान नहीं किया गया है।

वे कहते हैं, ‘कंपनियां मनमाने तरीके से इस तरह के गेम्स को स्किल गेम्स बताती रहती हैं। इससे गेमिंग इंडस्ट्री को सुप्रीम कोर्ट में राहत मिल सकती है। जिससे देश को हजारों करोड़ रुपए के टैक्स का नुकसान हो सकता है, जो इन कंपनियों से वसूला जाना बाकी है।‘

संविधान की सातवीं अनुसूची के मुताबिक, जुए और सट्टेबाजी पर टैक्स या रेगुलेशन लाने का अधिकार राज्य सरकारों के पास है। पिछले कुछ सालों में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश समेत कई राज्य सरकारों ने कानून बनाए। विराग गुप्ता कहते हैं कि कानून बनाने में राज्य सरकारों से सलाह लेनी चाहिए थी, क्योंकि ये राज्य के विषय हैं। राज्यों के कानून को भी देखना चाहिए था।

ऑनलाइन मनी गेमिंग की वजह से डिप्रेशन तेजी से बढ़ा ऑनलाइन मनी गेमिंग के ट्रैप में लोग कैसे फंसते हैं और इसके पीछे क्या साइकोलॉजी है? दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड अलायड साइंसेज (IHBAS) में साइकेट्री के प्रोफेसर डॉ. ओम प्रकाश समझाते हैं। वे कहते हैं, ‘ऑनलाइन मनी गेमिंग सिर्फ गेम नहीं है, ये एक डिजिटल कैसिनो है। इसमें जो सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक ट्रैप है, वे रिवॉर्ड एंड पनिशमेंट सिस्टम है।‘

वे इस पूरी प्रोसेस को समझाते हुए कहते हैं, ‘कभी जीत मिलती है, तो डोपामिन नामक केमिकल ब्रेन में रिलीज होता है, जो आपको अच्छा महसूस कराता है। हारने पर दिमाग ये सोचता है कि अगली बार जीतकर नुकसान पूरा करेंगे। इसे हम लॉस-चेजिंग बिहेवियर कहते हैं। यही साइकिल बार-बार रिपीट होती है और व्यक्ति को जकड़ लेती है।’

डॉ. प्रकाश कहते हैं, ’कंपनियां इन एप्स को ऐसे डिजाइन करती हैं कि ये तुरंत खुशी देती हैं, जैसे- छोटे-छोटे रिवॉर्ड्स, नोटिफिकेशन, कलरफुल ग्राफिक्स, ये सब मिलकर एक तरह का एडिक्शन पैदा कर देता है। IHBAS जैसे बड़े मेंटल हेल्थ इंस्टीट्यूट में औसतन रोजाना 1-2 नए मरीज इस लत के साथ आते हैं। महीने में 25-30 नए केस मिल जाते हैं।’

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इसकी लत से डिप्रेशन बहुत तेजी से बढ़ता है। लगातार नुकसान, कर्ज, शर्मिंदगी, ये सब व्यक्ति को गहरे अवसाद में ले जाते हैं।

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जो लोग इस तरह के गेम्स के एडिक्ट हो चुके हैं, उन्हें क्या करना चाहिए? इस पर डॉ. प्रकाश कहते हैं, ’ऐसे लोगों को गेमिंग एप्स तुरंत डिलीट करने चाहिए। इसके अलावा फोन का इस्तेमाल लिमिटेड करना चाहिए और टाइमटेबल बनाना चाहिए। दिक्कत आने पर मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से मिलना चाहिए।’

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