यूपी में ‘आई लव मोहम्मद’ बनाम ‘आई लव योगी’ विवाद: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या कानून-व्यवस्था की चुनौती?
लखनऊ/बरेली : उत्तर प्रदेश इन दिनों दो विरोधी नारों और प्रतीकों के टकराव से सुर्खियों में है। एक ओर बरेली में जुमे की नमाज़ के बाद भीड़ ने ‘आई लव मोहम्मद’ के नारे लगाए, दूसरी ओर लखनऊ की सड़कों पर ‘आई लव योगी आदित्यनाथ जी’ और ‘आई लव बुलडोजर’ के बड़े-बड़े पोस्टर लगा दिए गए। दोनों घटनाओं ने मिलकर प्रदेश का माहौल गरमा दिया है और राजनीतिक ध्रुवीकरण की आशंका को और गहरा कर दिया है।
# बरेली: जुमे की नमाज़ के बाद विवाद
शुक्रवार को बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे और ‘आई लव मोहम्मद’ की नारेबाजी की। पुलिस का कहना है कि भीड़ को तितर-बितर करने के लिए हल्का बल प्रयोग करना पड़ा। प्रशासन ने इसे कानून-व्यवस्था का मुद्दा बताते हुए सतर्कता बढ़ा दी है।
लखनऊ: ‘आई लव योगी’ और ‘आई लव बुलडोजर’ पोस्टर
राजधानी लखनऊ में बीजेपी युवा मोर्चा के नेता अमित त्रिपाठी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थन में बड़े पोस्टर लगवाए हैं। इन पर लिखा है:
* “आई लव श्री योगी आदित्यनाथ जी”
* “आई लव बुलडोजर”
पोस्टर प्रमुख चौराहों पर लगाए गए हैं और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गए। नगर निगम और पुलिस विभाग यह जांच कर रहे हैं कि क्या इनके लिए औपचारिक अनुमति ली गई थी।
# संवैधानिक परिप्रेक्ष्य
भारत का संविधान नागरिकों को अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है।
लेकिन इसके साथ ही अनुच्छेद 19(2) यह भी कहता है कि यह स्वतंत्रता कानून-व्यवस्था, सार्वजनिक शांति, सदाचार और राज्य की सुरक्षा के अधीन सीमित की जा सकती है।
* ‘आई लव मोहम्मद’ नारे – धार्मिक अभिव्यक्ति का हिस्सा है, लेकिन यदि यह सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करता है तो पुलिस हस्तक्षेप कर सकती है।
* ‘आई लव योगी/बुलडोजर’ पोस्टर – राजनीतिक अभिव्यक्ति है, जो लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन यदि यह सार्वजनिक स्थलों पर बिना अनुमति लगाया गया है, तो नगर निकाय नियमों के तहत कार्रवाई हो सकती है।
# राजनीतिक रंग
* विपक्ष का आरोप है कि सरकार धार्मिक और राजनीतिक प्रतीकों को टकराव में बदलकर असली मुद्दों से ध्यान भटका रही है।
* बीजेपी समर्थक इसे लोकतांत्रिक अधिकार और योगी सरकार की नीतियों के प्रति जनसमर्थन बता रहे हैं।
* कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ‘आई लव बुलडोजर’ जैसे नारे कानून-व्यवस्था पर सख्ती का प्रतीक बन चुके हैं, जो समर्थकों के लिए गर्व और विरोधियों के लिए डर का कारण है।
# सामाजिक दृष्टिकोण
समाजशास्त्रियों का कहना है कि इस तरह के नारे और पोस्टर धार्मिक व राजनीतिक पहचान की प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देते हैं। यदि इसे समय रहते नियंत्रित न किया गया, तो यह प्रदेश के सामाजिक ताने-बाने में ध्रुवीकरण और अविश्वास को गहरा कर सकता है।
‘आई लव मोहम्मद’ और ‘आई लव योगी’ विवाद सिर्फ नारे और पोस्टरों तक सीमित नहीं है। यह सवाल खड़ा करता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून-व्यवस्था की सीमा-रेखा कहाँ खींची जाए?
सुप्रीम कोर्ट पहले ही कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि धार्मिक या राजनीतिक अभिव्यक्ति तब तक सुरक्षित है जब तक वह हिंसा, नफ़रत या सार्वजनिक अशांति का कारण न बने।
👉 आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यूपी सरकार और प्रशासन इसे ध्रुवीकरण के मुद्दे में बदलते हैं या इसे कानून-व्यवस्था की कसौटी पर संतुलित कर पाते हैं।











