
जरवल में सकल हिंदू समाज का सम्मेलन संगठित हिंदू-समर्थ भारत पर चर्चा पंच परिवर्तन का आह्वान

शक्ति शब्दों में नहीं, संगठन में होती
बहराइच। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष जैसे ऐतिहासिक कालखंड में जरवल में आयोजित विराट “हिंदू सम्मेलन” केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि हिंदू समाज के स्वाभिमान, चेतना और अपने भविष्य के संरक्षण की चेतावनी का स्पष्ट उद्घोष रहा।
इस महासम्मेलन में जरवल के हज़ारो से अधिक की संख्या में एकत्रित सनातनी हिंदुओं ने सहभाग कर यह सिद्ध कर दिया कि हिंदू समाज अब न बिखरा है, न भ्रमित और न ही मौन है— बल्कि वह एकजुट होकर अपनी पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट हो चुका है।
इस ऐतिहासिक आयोजन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बहराइच के जिला प्रचारक मुख्य वक्ता के रूप में सम्बोधित किया तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रमोद यज्ञसैनी ने किया एवं सहित प्रखर सनातनियों ने इस सम्मेलन को आध्यात्मिक ऊर्जा और राष्ट्रवादी चेतना से ओत-प्रोत कर दिया। संघ के सौ वर्ष केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि यह तय करने का निर्णायक समय है कि हिंदू समाज अब अपनी सहिष्णुता को कमजोरी नहीं बनने देगा।
सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि हिंदुत्व कोई नारा नहीं, बल्कि भारत की सनातन जीवन-दृष्टि, संस्कृति और राष्ट्र की आत्मा है। आज एकता कोई विकल्प नहीं, बल्कि अस्तित्व की अनिवार्यता बन चुकी है। मतभेदों को त्यागकर, स्वाभिमान को अपना शस्त्र बनाकर और राष्ट्र को सर्वोपरि मानकर हमें एकजुट होना ही होगा। यह समय आग्रह का नहीं, उद्घोष का है — यह समय सहने का नहीं, खड़े होने का है। हिंदुत्व की अटूट एकता के माध्यम से एक समर्थ भारत और सनातन राष्ट्र के पुनर्निर्माण का यह संकल्प अब रुकने वाला नहीं है।













