
*महान बनने से पहले लघु बनना पड़ता है–सुनयमति जी*
*नगर गौरव के दीक्षा दिवस पर व्रती परिवार का सम्मान किया*
धर्म के संस्कार दुकान पर मिलने वाली कोई वस्तु नहीं है।वह तो जन्मजात और पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली प्रक्रिया है।बालक में धर्म के संस्कार उसके परिवार से ही मिलते हैं।माता और पिता इसके सर्वोच्च माध्यम हैं।इसीलिये घर व परिवार को संस्कारो की नर्सरी कक्षा कहा जाता है।जिस तरह गुरु बनने के लिये पहले शिष्य और भगवान बनने से पहले भक्त बनना जरूरी है, उसी तरह मुनि बनने से पहले सच्चा व्रती बनना आवश्यक होता है।
मुनि सेवा समिति मीडिया प्रभारी सुनील जैन एवं प्रेमांशु चौधरी ने बताया कि सराफा स्थित पोरवाड़ जैन धर्मशाला में विराजित आर्यिका सुनयमति माताजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए उक्त उद्गार व्यक्त किये।उन्होंने कहा कि जैन धर्म के मूल मंत्र णमोकार मन्त्र मे अरिहंत,सिद्ध,आचार्य,उपाध्याय और सभी मुनिराजों को केवल नमस्कार किया गया है।यह मंत्र भी हमे यही शिक्षा देता है कि सबसे पहले झुकना सीखना चाहिये।अर्थात महान बनने के पूर्व लघु बनने की कला आना चाहिये।
*विनयांजलि सभा सम्पन्न*
सुनील जैन ने बताया कि खण्डवा नगर के गौरव पूज्य मुनि श्री सुप्रभसागर जी के मुनि दीक्षा के 12 वर्ष पूर्ण होने पर सुनयमति माताजी के सानिध्य में विनयांजलि सभा का आयोजन किया गया।उल्लेखनीय है कि खण्डवा के सराफा बाजार निवासी श्रीमती मधुबाला नवीनचंद के घर जन्मे युवा बाल ब्रम्हचारी कपिल भैया ने 2 फरवरी 2012 को आचार्य वर्धमानसागर जी से मुनि दीक्षा ग्रहण की थी।मुनि दीक्षा के उपरांत उनका नाम सुप्रभसागर रखा गया।सभा मे श्रीमती श्रद्धा मनीष जैन,नमिता विपुल जैन,अतुल जैन,प्रदीप कासलीवाल,पोरवाड़ जैन समाज के अध्यक्ष वीरेंद्र जैन ने मुनि श्री के ग्रहस्थ अवस्था के संस्मरणो को याद करके सबको द्रवित कर दिया।मुनि श्री वर्तमान में मनासा नगर में विराजित होकर धर्म प्रभावना कर रहे हैं।
*व्रती परिवारजनों का किया सम्मान*
मुनि सेवा समिति द्वारा खण्डवा का गौरव बढाने वाले मुनि सुप्रभसागर जी के ग्रहस्थ अवस्था के परिवारजन चिंतामन जैन,विपिन जैन,मनीष जैन,आनंद जैन,विकास जैन,संयोगिता जैन,करिश्मा जैन,योगिता संदीप,आर्ची का तिलक,धर्म वस्त्र,माला पहनाकर सम्मान किया गया।अंत मे सभी उपस्थिजनो ने मुनि श्री को अर्घ्य समर्पित का नमोस्तु निवेदित किया।संचालन अविनाश जैन ने किया।












