
आचार्य श्री ने सीता विदाई एवं राम वनवास का मार्मिक चित्रण किया।
पिता पुत्र के हित में निर्णय लेते हैं।
“आचार्य विभव सागर जी”
श्री राम ने वनवास काल में अनेक आदर्श स्थापित किय।
खंडवा/
नवकार नगर स्थित भगवान मुनि सुव्रतनाथ जिनालय परिसर में राम कथा पर आधारित प्रवचन सभा में आचार्य विराग सागर महाराज के परम प्रभावक शिष्य आचार्य श्री विभव सागर जी ने सीता जी की मां विदेहा का विदाई से पूर्व सीता को संबोधन का मार्मिक चित्रण किया। आचार्य श्री ने संवाद शैली में कहा ,सीता जी की मां कहती हैं। इस घर में रहते हुए जो जो उत्तम कार्य तुमने सीखे ,वह अपने ससुराल में भी करना । पुत्री सबसे मधुर संभाषण करना। पहले उठना बाद में सोना ।बड़ों के प्रति आदर भाव व छोटों के प्रति वात्सल्य रखना। सुबह उठते ही घर की साफ सफाई के पश्चात घर के मुख्य द्वार पर मांगलिक चौक पूरना। शील ही सबसे बड़ा आभूषण है। सोने चांदी का शील के समान कोई मूल्य नहीं है। सदैव शील की रक्षा करना। पुत्री वस्त्र वही धारण करना जो संस्कृति व सभ्यता के अनुरूप हो ।कभी ऐसे वस्त्र नहीं पहनना जिससे मर्यादा का उल्लंघन हो।
समाज के सचिव सुनिल जैन ने बताया कि आचार्य श्री ने अपने संबोधन में कहा की भारत में अनेक राम कथा प्रचलित हैं ।पद्म पुराण के अनुसार कैकई ने भारत को राज देने का वचन अवश्य मांगा। परंतु राम के वनवास का वचन नहीं मांगा। राम स्वयं भारत बिना किसी विकल्प के राजकाज का संचालन कर सकें इस हेतु वन हेतु प्रस्थान कर गए ।14 वर्षीय वनवास काल में आपने अनेक आदर्श स्थापित किय एवं कई लोगों का उत्थान किया। जैन रामायण के अनुसार दशरथ का देहांत पुत्र वियोग में नहीं हुआ। दशरथ ने अयोध्या स्थित मुनिराज से दिगंबर दीक्षा धारण कर अपना कल्याण किया।
पुत्र को कभी भी पिता के ऊपर आविश्वास नहीं करना चाहिए। पिता के निर्णय को स्वयं के लिए हितकर मानकर स्वीकार करना चाहिए।
उक्त जानकारी देते हुए समाज के आनंद कुमार जैन एवं मुनि सेवा समिति के मीडिया प्रभारी प्रेमांशु चौधरी ने बताया की संपूर्ण नवकार नगर में उत्साह का वातावरण है। जिनालय एवं संत निवास की विद्युत से सजावट की गई है। समस्त आचार्य संघ की आहार विधि संपन्न करने हेतु निवासरत परिवार जिनालय के समक्ष 10:30 बजे से उपस्थित हो जाते हैं। अपने घर पर संघ को आहार कराकर धन्य मानते हैं। आचार्य श्री विभव सागर जी ने लगभग 88 ग्रंथ की रचना की है। सभी ग्रंथ कल्याण में सहायक हैं।
आचार्य श्री एवं समस्त संघ के सानिध्य में प्रवचन के पूर्व मंगल में पूजन अभिषेक एवं शांति धारा की गई।












