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ओंकारेश्वर में ‘‘वंशावली और विरुदावली‘‘ विषय पर राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी सम्पन्न

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ओंकारेश्वर में ‘‘वंशावली और विरुदावली‘‘ विषय पर राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी सम्पन्न

खण्डवा//जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, संस्कृति विभाग मप्र शासन द्वारा ओंकारेश्वर में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का समापन प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नंदकुमार, प्रसिद्ध विचारक आशुतोष भटनागर एवं निदेशक डॉ. धर्मेंद्र पारे की उपस्थिति में सोमवार को हुआ। संगोष्ठी में देशभर के 60 से अधिक विद्वानों ने सहभागिता की। समापन सत्र में सम्बोधित करते हुए निदेशक डॉ. धर्मेंद्र पारे ने जनजातीय बोली विकास अकादमी द्वारा किए जा रहे कार्यों पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर अकादमी के द्वारा वंशावली एवं विरुदावली पर शोध पत्रों की संकलन पुस्तक ‘‘कुटुंब‘‘ का विमोचन किया गया। इसके पश्चात श्री विशिष्ट वक्ता आशुतोष ने सम्बोधित किया। उन्होंने कहा कि संगोष्ठी में युवा शोधार्थियों के द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाली भारतीय ज्ञान परंपरा एवं वंशावली को देखकर लगता है कि अब यह कार्य और बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि अपने जड़ों से जुड़े होने की जानकारी सभी को होनी चाहिए एवं इस पर बहुत काम करने की आवश्यकता है। जिससे भारतीय एकता का स्वरूप और सुदृढ़ हो सके।
कार्यक्रम में अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री जे. नंदकुमार ने कहा कि भारत के उत्तर से लेकर दक्षिण तक विभिन्न समुदाय के लोग हमारी भारतीय वंशावली के संधारण का कार्य कर रहे हैं। हमारे देश की वंशावलियों में लिखित परंपरा से अधिक मौखिक परंपरा का निर्वहन किया जाता है, यह अपने आप में अनूठी बात है। केरल में विरुदावली के रूप में वड़क्कन परंपरा निभाई जाती है जिसमें वीरों के चरित लिखे गए हैं। उन्होंने कहा कि पुराने समय की बही, पंजीपत्रों का क्षरण हो रहा है जिससे हमारा सांस्कृतिक क्षरण हो रहा है। इस क्षरण को कम करने के लिए वंशावली संधारण का कार्य राष्ट्रीय स्तर पर किया जा सकता है। यह एक सांस्कृतिक कार्य के साथ आध्यात्मिक कार्य भी है। इस अवसर पर वरिष्ठ अध्येता श्रीकृष्ण जुगनू, डॉ. शैलेन्द्र कुमार शर्मा, डॉ श्रीकृष्ण काकड़े प्रमुख रूप से उपस्थित थे।

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