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क्या सत्ता समीकरण बदलने की आहट है?

9 और 17 सितंबर के बीच के बेचैनी का राजनीतिक सच

क्या सत्ता-समीकरण बदलने की आहट है?

(9 और 17 सितंबर के बीच की बेचैनी का राजनीतिक सच)

भारतीय राजनीति इस समय एक अजीब से ऊहापोह में है।
एक ओर 9 सितंबर को उपराष्ट्रपति का चुनाव है, तो दूसरी ओर 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 75 वर्ष पूर्ण होने वाले हैं।
ये दोनों तिथियाँ सामान्य संवैधानिक घटनाएँ प्रतीत होती हैं, लेकिन इनके इर्द-गिर्द जिस तरह का माहौल बना है, वह दर्शाता है कि राजनीति के भीतर कोई गहरी हलचल है।

✦ उपराष्ट्रपति चुनाव : औपचारिकता या संकट का संकेत?

सामान्य परिस्थितियों में उपराष्ट्रपति का चुनाव औपचारिक माना जाता है। सत्ता पक्ष के पास बहुमत हो और विपक्ष बिखरा हो तो यह चुनाव महज़ प्रक्रिया रह जाता है।
लेकिन इस बार स्थिति अलग है।
भोजों का अचानक रद्द होना, नेताओं की अप्रत्याशित मुलाकातें, और सोशल मीडिया पर तैरते स्पेकुलेशन बताते हैं कि सत्तारूढ़ दल भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं है।
एनडीए सांसदों की गिनती छिपाने जैसी रणनीतियाँ यही दर्शाती हैं कि भरोसे में दरार है।

✦ भाजपा के भीतर बेचैनी

बीजेपी को लेकर दो तरह की तस्वीर सामने आती है—
एक ओर प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की मज़बूत जोड़ी है, दूसरी ओर वरिष्ठ और उभरते नेताओं की महत्वाकांक्षाएँ।
नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथ, वसुंधरा राजे, यहां तक कि शिवराज सिंह चौहान जैसे नाम बार-बार उभर रहे हैं।
आरएसएस के मंच से मुरली मनोहर जोशी द्वारा आर्थिक नीतियों पर की गई आलोचना और उस पर संघ प्रमुख की सहमति, सत्ता और संगठन के रिश्ते में तनाव की झलक देती है।
कांस्टीट्यूशन क्लब चुनाव में शाह-लॉबी की हार ने यह साफ़ कर दिया है कि पार्टी के भीतर एक “काउंटर लॉबी” अब सक्रिय है।

✦ विपक्ष की रणनीति और नैतिक दबाव

विपक्ष संख्याबल से भले ही पीछे हो, लेकिन उसने भाजपा को घेरने का मनोवैज्ञानिक खेल बखूबी खेला है।
राहुल गांधी का बयान कि “बीजेपी सांसद संपर्क में हैं”, नायडू और कांग्रेस की कड़ी, नीतीश और जयंत के नाम का उछलना—यह सब विपक्ष को सक्रिय बनाए हुए है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि चुनाव भले न पलटे, पर भाजपा नैतिक रूप से दबाव में है।

✦ क्या होगा 17 सितंबर को?

प्रधानमंत्री का 75 वर्ष पूर्ण होना महज़ व्यक्तिगत क्षण नहीं है, यह सत्ता-राजनीति के संदर्भ में “उत्तराधिकार बहस” को जन्म देता है।
क्या मोदी के बाद कौन—यह सवाल भाजपा और संघ दोनों के भीतर दबे स्वर में गूंज रहा है।
मोदी का इस्तीफा देना कल्पना मात्र हो सकता है, लेकिन यह भी सच है कि 9 और 17 सितंबर के बीच का घटनाक्रम भारतीय राजनीति की दिशा को बदल सकता है।

✦ जनता की नज़र से

आम नागरिक के लिए सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या यह सब केवल सत्ता की कुर्सी की खींचतान है या लोकतांत्रिक भविष्य का कोई नया अध्याय खुलने वाला है?
महँगाई, बेरोज़गारी और सामाजिक तनाव के बीच जनता यह चाहती है कि सत्ता में बैठे लोग अपने भीतर की लड़ाइयों से ऊपर उठकर देश की समस्याओं का समाधान करें।

भारतीय राजनीति इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है।
उपराष्ट्रपति का चुनाव चाहे किसी भी परिणाम पर पहुँचे, यह साफ़ है कि भाजपा अब पहली बार अपने ही कुनबे की बेचैनी और विपक्ष के नैतिक दबाव से जूझ रही है।
यह चुनाव केवल उपराष्ट्रपति के लिए नहीं, बल्कि मोदी युग के भीतर पहली आंतरिक चुनौती का प्रतीक बन गया है।

क्या यह चुनौती सत्ता समीकरण बदलने का संकेत है, या फिर महज़ राजनीतिक शोर-शराबा?
उत्तर 9 और 17 सितंबर के बीच की घटनाओं में छिपा है—और पूरा देश इस प्रतीक्षा में है कि आने वाले दिन भारतीय राजनीति की नई पटकथा लिखते हैं या पुराने ढर्रे को ही आगे बढ़ाते हैं।

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