भारत की पत्रकारिता कभी जनता की आवाज़ हुआ करती थी। सत्ता से सवाल पूछना, प्रशासन की जवाबदेही तय करना और आम आदमी की समस्याओं को सुर्खियों में लाना—यही उसकी पहचान थी। लेकिन आज तस्वीर पलट चुकी है।
“न्यू इंडिया का मीडिया” अब लोकतंत्र का प्रहरी नहीं रहा, बल्कि सत्ता की जयकार का पुजारी बन चुका है। न्यूज़ चैनलों पर बहसें अब सवाल उठाने के लिए नहीं, बल्कि विपक्ष को घेरने और सरकार की छवि चमकाने के लिए आयोजित की जाती हैं। अख़बारों की सुर्खियां अब जनता की पीड़ा नहीं बतातीं, बल्कि सत्ता के महलों की चमक बयान करती हैं।
आज आप किसी भी चैनल को खोल लीजिए—
* किसानों की आत्महत्याएं गायब होंगी, लेकिन प्रधानमंत्री का हेलीकॉप्टर लैंडिंग लाइव दिखेगा।
* महंगाई पर कोई बहस नहीं होगी, पर ‘भारत ने विश्व को दिखाया दम’ जैसे हेडलाइन जरूर मिलेंगे।
* बेरोजगारी के आंकड़ों पर चुप्पी होगी, लेकिन प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर विशेष डॉक्यूमेंट्री तैयार मिलेगी।
सवाल यह है कि जब मीडिया ही सत्ता के साथ खड़ा हो जाए, तो जनता की आवाज़ कौन बनेगा?
दरअसल, यह “न्यू इंडिया संस्करण” वही है जहां सवाल पूछना गुनाह और चाटुकारिता करना गुण बन गया है। सत्ता की कठपुतली बने एंकर चमकीले स्टूडियो में बैठकर ललकारते हैं, पर उनकी ललकार जनता के पक्ष में नहीं, बल्कि सत्ता की ढाल के रूप में होती है।
याद कीजिए—इमरजेंसी के दौर में भी पत्रकारों ने अपने कर्तव्य निभाए, जेल गए, सेंसरशिप झेली लेकिन सत्ता से सवाल करने का हौसला रखा। मगर आज लोकतंत्र की यह विडंबना है कि बिना किसी आधिकारिक सेंसरशिप के भी मीडिया खुद ही अपनी आत्मा बेच चुका है।
👉 यह पत्रकारिता नहीं, यह लोकतंत्र का सौदा है।
“मीडिया का न्यू इंडिया संस्करण” दरअसल एक सवालों की कब्रगाह है—जहां असली मुद्दे दफन हैं और सतही नारे व चमकीले पोस्टर हर रोज़ जनता को परोसे जाते हैं।
- अगर यह स्थिति बदली नहीं, तो आने वाली पीढ़ियां जब भारतीय लोकतंत्र की कहानी पढ़ेंगी, तो मीडिया का यह दौर उन्हें सबसे काला अध्याय नज़र आएगा।









