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मेंढ़ुका आंगनबाड़ी का छज्जा गिरा, बाल – बाल बचे 20 मासूम आदिवासी बच्चे

महिला एवं बाल विकास विभाग कर्मचारियों की लापरवाही शिकायत के बाद भी कोई कारवाही नहीं

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही के आदिवासी अंचल क्षेत्र ग्राम मेंढ़ुका में घटी घटना जहां पर आंगनबाड़ी केंद्र के छत आज अचानक तेज हवाओं के कारण गिरी जिस आंगनबाड़ी में बच्चों के भविष्य की पहली नींव रखी जाती हे, वहां 20 मासूमों की जान को विभाग ने जर्जर भवन के भरोसे छोड़ दिया। केंद्र का छज्जा अचानक भरभराकर गिर पड़ा। गनीमत रही कि कोई बच्चा उसकी चपेट में नहीं आया, अन्यथा यह घटना जिले की सबसे बड़ी प्रशासनिक लापरवाही में बदल सकती थी।

जर्जर भवन में मौत के साये तले बैठाए जा रहे थे बच्चे

ग्रामीणों का आरोप है कि आंगनबाड़ी भवन लंबे समय से खस्ताहाल था। छज्जे में दरारें, टूटे हिस्से और जर्जर संरचना किसी बड़े हादसे की चेतावनी दे रही थीं। इसके बावजूद विभाग ने न तो भवन की मरम्मत कराई और न ही बच्चों को किसी सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट करने की जरूरत समझी। सवाल यह है कि आखिर अधिकारियों को हादसे का इंतजार क्यों था?कुछ सेकंड का फर्क, टल गया बड़ा हादसा

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक घटना के वक्त करीब 20 बच्चे केंद्र में मौजूद थे। अचानक तेज आवाज के साथ छज्जा गिरा और वहां अफरा-तफरी मच गई। कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों ने तत्काल बच्चों को बाहर निकाला। यदि छज्जा कुछ फीट इधर-उधर गिरता या बच्चे उसके नीचे होते, तो कई परिवारों के घरों में मातम पसरा होता। दूरस्थ आदिवासी क्षेत्र में हुई इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आदिवासी बच्चों की सुरक्षा विभाग की प्राथमिकताओं में शामिल है भी या नहीं? जिन बच्चों को पोषण, शिक्षा और सुरक्षा देने की जिम्मेदारी शासन की है, उन्हें जर्जर भवनों में बैठाकर उनकी जान जोखिम में डाली जा रही है।

सुशासन के दावों की खुली पोलl

सरकार और विभाग बच्चों के विकास तथा सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन मेंढ़ुका की घटना ने उन दावों की जमीनी हकीकत उजागर कर दी है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि इस हादसे में किसी बच्चे की जान चली जाती, तो जिम्मेदारी तय करने की बजाय लीपापोती शुरू हो जाती।

भर्ती विवादों में उलझे अफसर, जमीनी व्यवस्थाएं भगवान भरोसे

स्थानीय लोगों का आरोप है कि विभागीय अधिकारी, जिनमें जिला कार्यक्रम अधिकारी अमित सिन्हा का नाम भी चर्चा में है, विभागीय व्यवस्थाओं को सुधारने के बजाय भर्ती प्रक्रियाओं और विवादों में अधिक व्यस्त दिखाई देते हैं। नतीजा यह है कि दूरस्थ क्षेत्रों के आंगनबाड़ी केंद्रों की हालत लगातार बदतर होती जा रही है और बच्चों की सुरक्षा रामभरोसे है।

जवाब दे विभाग: हादसे का इंतजार क्यों?

मेंढ़ुका की घटना केवल एक छज्जा गिरने की घटना नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की संवेदनहीनता का प्रतीक बनकर सामने आई है। अब जरूरत जिले के सभी आंगनबाड़ी भवनों की तत्काल जांच, जर्जर केंद्रों को बंद कर सुरक्षित स्थानों पर संचालन और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की है। बड़ा सवाल यही है—क्या विभाग अब भी जागेगा या किसी मासूम की जान जाने के बाद कार्रवाई का ढोंग किया जाएगा?

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