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कोर्ट के आदेश भी बेअसर, संखापार माफी की पोखरी अतिक्रमण में कैद

कुशीनगर जिले के सुकरौली विकासखंड अंतर्गत संखापार माफी गांव में स्थित सरकारी पोखरी प्रशासनिक उदासीनता और दबंगई की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। न्यायालय के स्पष्ट आदेश के बावजूद आज तक न तो पोखरी की खुदाई कराई गई और न ही अतिक्रमण हटाया जा सका। नतीजा यह है कि गांव की यह ऐतिहासिक और उपयोगी पोखरी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है, जबकि इसके बाहर की सड़क पर जमा पानी ग्रामीणों के लिए रोजमर्रा की मुसीबत बना हुआ है।

कुशीनगर जिले के सुकरौली विकासखंड अंतर्गत संखापार माफी गांव में स्थित सरकारी पोखरी प्रशासनिक उदासीनता और दबंगई की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। न्यायालय के स्पष्ट आदेश के बावजूद आज तक न तो पोखरी की खुदाई कराई गई और न ही अतिक्रमण हटाया जा सका। नतीजा यह है कि गांव की यह ऐतिहासिक और उपयोगी पोखरी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है, जबकि इसके बाहर की सड़क पर जमा पानी ग्रामीणों के लिए रोजमर्रा की मुसीबत बना हुआ है।
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राजस्व अभिलेखों के अनुसार संखापार माफी गांव में स्थित यह पोखरी आरा. नं. 207, रकबा 0.109 हेक्टेयर में दर्ज है। यह पोखरी लंबे समय तक गांव की जल निकासी और जल संरक्षण का प्रमुख साधन रही। बरसात के दिनों में आसपास के इलाके का पानी इसी पोखरी में समाहित हो जाता था, जिससे सड़कें और घर सुरक्षित रहते थे। लेकिन बीते कुछ वर्षों में कुछ दबंगों द्वारा पोखरी की जमीन पर अवैध कब्जा कर लिया गया। आरोप है कि अतिक्रमणकारियों ने पोखरी के भीतर मकान तक बना लिए, जिससे इसका प्राकृतिक स्वरूप पूरी तरह बिगड़ गया।
ग्रामीणों ने जब इस गंभीर समस्या के खिलाफ आवाज उठाई तो मामला न्यायालय तक पहुंचा। न्यायालय द्वारा 28 जुलाई 2025 (वार संख्या 202405440200343) को पोखरी की खुदाई कराने और अतिक्रमण हटाने का स्पष्ट आदेश दिया गया। इसके बावजूद आज तक जमीनी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। ग्रामीणों का कहना है कि आदेश केवल कागजों तक सीमित रह गया है और संबंधित विभाग आंख मूंदे बैठे हैं।
पोखरी की खुदाई न होने और अतिक्रमण बने रहने का सबसे बड़ा खामियाजा गांव के आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। पोखरी का पानी बाहर निकलकर सड़क पर जमा हो जाता है, जिससे पूरे साल रास्ता कीचड़ और जलभराव की चपेट में रहता है। स्कूली बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को आवागमन में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कई बार लोग फिसलकर गिर चुके हैं, जिससे हादसों की आशंका बनी रहती है। वहीं, गंदा पानी जमा रहने से मच्छरों का प्रकोप बढ़ गया है और संक्रामक बीमारियों का खतरा लगातार मंडरा रहा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार लेखपाल, ग्राम पंचायत, तहसील और ब्लॉक स्तर के अधिकारियों को शिकायतें दीं, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला। मौके पर न तो कोई स्थायी समाधान किया गया और न ही अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हुई। इससे दबंगों के हौसले और बुलंद हो गए हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते न्यायालय के आदेश का पालन कर पोखरी की खुदाई कराई जाए और अतिक्रमण हटाया जाए, तो गांव की जल निकासी की समस्या काफी हद तक समाप्त हो सकती है। साथ ही, गांव को उसका पारंपरिक जलस्रोत वापस मिल जाएगा, जिससे जल संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि कोर्ट के आदेश का सख्ती से अनुपालन कराया जाए और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों तथा अतिक्रमण करने वाले दबंगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब न्यायालय के आदेश भी प्रभावी नहीं हो पा रहे हैं, तो आम ग्रामीण अपनी पीड़ा आखिर किसके सामने रखें? संखापार माफी की पोखरी आज प्रशासनिक लापरवाही और सिस्टम की कमजोरी का जीता-जागता उदाहरण बन चुकी है।

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