
विशेष संवाददाता सैयद इशाक अली
[डिंडोरी]: जिले में इन दिनों सट्टे का अवैध कारोबार पूरी तरह से पैर पसार चुका है। शहर की तंग गलियों से लेकर ग्रामीण इलाकों के चाय-पान के खोखों तक, सट्टे की पर्चियां धड़ल्ले से काटी जा रही हैं। पुलिस और प्रशासन की कथित मुस्तैदी को ठेंगा दिखाते हुए सट्टा माफिया चांदी काट रहे हैं, जबकि इसकी लत में पड़कर जिले की युवा पीढ़ी और मजदूर वर्ग पूरी तरह से कंगाल हो रहा है।
डिजिटल हुआ सट्टे का नेटवर्क, ‘ऐप’ और ‘व्हाट्सएप’ पर डील
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, अब सट्टे का यह काला धंधा केवल पर्चियों तक सीमित नहीं रह गया है। सट्टा माफियाओं ने खुद को हाईटेक कर लिया है। अब पूरा खेल मोबाइल ऐप्स, वेबसाइट्स और व्हाट्सएप ग्रुप्स के जरिए संचालित हो रहा है।
कोडवर्ड का खेल: पैसे का लेन-देन डिजिटल वॉलेट्स (UPI) के जरिए किया जा रहा है।
गुर्गे सक्रिय: शहर के मुख्य चौराहों, सूनसान इलाकों और ढाबों पर सटोरियों के एजेंट सक्रिय हैं, जो नए शिकार (विशेषकर कॉलेज के छात्रों) को जाल में फंसाते हैं।
मजदूर और युवा वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित
इस अवैध धंधे की सबसे बड़ी मार दैनिक वेतन भोगी मजदूरों और युवाओं पर पड़ रही है। दिनभर हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले मजदूर चंद रुपयों के लालच में अपनी गाढ़ी कमाई इन सटोरियों के हवाले कर रहे हैं। वहीं, शॉर्टकट से अमीर बनने के चक्कर में स्कूल-कॉलेज के छात्र भी इसके दलदल में धंसते जा रहे हैं, जिससे घरों में आपसी कलह और चोरी जैसी आपराधिक घटनाएं बढ़ रही हैं।
नाम न छापने की शर्त पर एक स्थानीय निवासी ने बताया:
“गली के नुक्कड़ पर सुबह से ही सटोरियों का जमावड़ा लग जाता है। पुलिस की गाड़ी आती भी है, तो महज औपचारिकता निभाकर चली जाती है। जब तक बड़े आकाओं पर कार्रवाई नहीं होगी, यह धंधा बंद नहीं होने वाला।”
मिलीभगत या लाचारी? जनता उठा रही सवाल











