

रिपोर्टर – भव्य जैन
शारदा विद्या मंदिर, झाबुआ में शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के मूल्यों से जुड़ी हुई है। विद्यालय में प्रतिदिन विद्यार्थियों को यह प्रेरणा दी जाती है कि भोजन की पहली रोटी गाय के लिए निकाली जानी चाहिए। इस परंपरा को आत्मसात करते हुए सभी विद्यार्थी अपने घर से पहली रोटी लेकर विद्यालय आते हैं और प्रवेश के समय परिसर में रखे *‘गाय की रोटी पात्र’* में श्रद्धापूर्वक अर्पित करते हैं।
विद्यालय परिसर में स्थित गौशाला इस संस्कार को और भी अर्थपूर्ण बनाती है। विद्यार्थी समय-समय पर वहाँ जाकर गौ सेवा करते हैं — गायों को चारा डालते हैं, जल अर्पित करते हैं और गौमाता के प्रति प्रेम एवं सेवा की भावना का अनुभव करते हैं।
गौसेवा से केवल आध्यात्मिक संतोष ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। गौमूत्र और गोबर से निर्मित उत्पाद पर्यावरण शुद्ध करते हैं, खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ाते हैं और रासायनिक प्रदूषण को कम करते हैं। इस प्रकार गाय भारतीय जीवन पद्धति में अर्थ, आरोग्य और आध्यात्मिकता तीनों की आधारशिला मानी जाती है।
विद्यालय के संचालक श्री ओम शर्मा ने बताया कि “संस्कार देना ही सच्ची शिक्षा है। जब बच्चों में करुणा, सेवा और सम्मान की भावना विकसित होती है, तब वे केवल सफल नहीं, बल्कि श्रेष्ठ नागरिक बनते हैं। पहली रोटी गाय के लिए निकालना बच्चों को कृतज्ञता, साझा भाव और जीवों के प्रति दया सिखाता है। यही भारतीय संस्कृति की जड़ है, और यही शारदा विद्या मंदिर की पहचान।”
विद्यालय परिवार का यह प्रयास विद्यार्थियों और उनके परिवारों दोनों में गौसेवा और पर्यावरण संरक्षण की चेतना को जागृत कर रहा है। *जन्मदिन, विवाह वर्षगांठ और अन्य शुभ अवसरों* पर विद्यार्थी एवं उनके परिवारजन गौशाला में गौ-आहार लेकर आते हैं और गौमाता को अर्पित करते हैं।
यह परंपरा विद्यालय में संस्कार, सेवा और संस्कृति का जीवंत संगम प्रस्तुत करती है — जहाँ हर दिन शिक्षा के साथ जीवन मूल्यों का भी पोषण होता है।
जहाँ पहली रोटी गाय के लिए निकलती है, वहीं से सच्चे संस्कारों की शुरुआत होती है








