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आदिवासी भुमि की रक्षा ओर वक़्फ़ बोर्ड के हस्तक्षेप को रोकने के लिए पुरे जनजातीय समाज की ओर से मोदी सरकार का हृदय से धन्यवाद- सांसद श्री पटेल

खरगोन ब्रेकिंग न्यूज़

*आदिवासी भूमि की रक्षा और वक्फ बोर्ड के हस्तक्षेप को रोकने के लिए पूरे जनजातीय समाज की ओर से मोदी सरकार का हृदय से धन्यवाद : लोकसभा सांसद, अनुसूचित जनजाति मोर्चा राष्ट्रीय महामंत्री गजेंद्र सिंह पटेल*

 

 📝*खरगोन से अनिल बिलवे की रिपोर्ट/ :*

खरगोन बड़वानी लोकसभा सांसद और अनुसूचित जनजाति मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री गजेंद्र सिंह पटेल ने बताया कि संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की सिफारिश में वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 हेतु निर्मित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) ने अपनी सिफारिश में स्पष्ट रूप से कहा है कि भारत के संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूचियों में जनजातीय भूमि की सुरक्षा के लिए बनाए गए ढांचे (फ्रेमवर्क) का सम्मान करते हुए आवश्यक कानूनी कदम उठाए जाएं। इन अनुसूचियों में अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातियों की भूमि को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है। जेपीसी ने यह भी संकेत दिया कि इस संरचना को लागू करने के लिए विधायी प्रावधानों की जरूरत है, ताकि जनजातीय अधिकारों का उल्लंघन न हो। इस संदर्भ में, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों का प्रसार) अधिनियम, 1996 (पेसा), वन अधिकार अधिनियम, 2006 (एफआरए), और सर्वोच्च न्यायालय के समता बनाम आंध्र प्रदेश (1997) निर्णय को आधार बनाया जाना चाहिए। इन तीनों कानूनी उपायों के परिप्रेक्ष्य में, वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 में ही जनजातीय भूमि की सुरक्षा के लिए स्पष्ट प्रावधान शामिल किए जाने चाहिए।

 

भारत के संविधान, पेसा और एफआरए में जनजातीय भूमि की सुरक्षा के लिए पहले से ही विशिष्ट और मजबूत प्रावधान मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची, जनजातीय क्षेत्रों में भूमि हस्तांतरण पर रोक और स्वशासन की व्यवस्था। पेसा, 1996 के तहत ग्राम सभाओं को भूमि प्रबंधन और संसाधनों पर अधिकार दिया गया है। एफआरए, 2006 के तहत वनवासी जनजातियों को उनकी पारंपरिक भूमि पर अधिकार और संरक्षण प्राप्त है। इन प्रावधानों के बावजूद, वक्फ बोर्डों द्वारा देश भर में जनजातीय और अनुसूचित क्षेत्रों की भूमि पर दावे किए गए हैं। यह स्थिति ऐतिहासिक अन्याय, कानूनी टकराव और दस्तावेजीकरण की कमी के कारण उत्पन्न हुई है। इसलिए, यह आवश्यक हो जाता है कि वक्फ (संशोधन) विधेयक में ही ऐसे प्रावधान हों, जो इन कानूनों का पालन सुनिश्चित करें और जनजातीय भूमि को वक्फ दावों से बचाएं।

 

विधेयक की धारा 3 में ‘अनुसूचित जनजाति भूमि’ को परिभाषित किया जाए। इसे एफआरए, पेसा और राज्य कानूनों के तहत मान्यता प्राप्त भूमि के रूप में वर्गीकृत किया जाए, जो वक्फ घोषणा से पूरी तरह मुक्त रहे। साथ ही, धारा 30 में यह प्रावधान हो कि ऐसी भूमि को वक्फ घोषित नहीं किया जा सके और यदि कोई दावा किया जाता है, तो वह शून्य माना जाए। धारा 4 में यह अनिवार्य किया जाए कि अनुसूचित क्षेत्रों में वक्फ संपत्तियों का सर्वेक्षण करने से पहले ग्राम सभा और जनजातीय कल्याण विभाग की लिखित सहमति ली जाए। इससे जनजातीय समुदायों की भागीदारी और पारदर्शिता सुनिश्चित होगी। धारा 5 में प्रावधान हो कि अनुसूचित जनजाति से संबंधित विवादित भूमि को संयुक्त जांच (जैसे ग्राम सभा और जिला प्रशासन द्वारा) के बिना वक्फ सूची में शामिल न किया जाए। धारा 36 में यह नियम जोड़ा जाए कि वक्फ संपत्ति के पंजीकरण से पहले जनजातीय कल्याण विभाग से प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य होगा। प्रमाणपत्र के अभाव में पंजीकरण शून्य माना जाए। धारा 47 में यह व्यवस्था हो कि वक्फ संपत्तियों के ऑडिट के दौरान जनजातीय भूमि से संबंधित आय-व्यय की रिपोर्ट राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) को प्रस्तुत की जाए। धारा 52A में यह नियम हो कि यदि कोई अनुसूचित जनजाति भूमि को अवैध रूप से वक्फ में हस्तांतरित करता है, तो दोषी को दोगुनी सजा और प्रभावित पक्ष को प्रतिपूर्ति (मुआवजा) दी जाए। धारा 83 में प्रावधान हो कि जनजातीय भूमि से संबंधित विवादों का निपटारा 90 दिनों के भीतर हो। यदि समय सीमा में समाधान न हो, तो वक्फ का दावा स्वतः निलंबित हो जाए। नई धारा 110A के तहत राज्य स्तर पर ‘अनुसूचित जनजाति लोकपाल’ की स्थापना हो, जिसे अवैध वक्फ पंजीकरण रद्द करने का अधिकार हो। धारा 108B में केंद्रीय सरकार को यह शक्ति दी जाए कि वह एफआरए और पेसा के अनुरूप नियम बनाए, ताकि इन कानूनों का प्रभावी कार्यान्वयन हो सके। एक नई धारा जोड़ी जाए, जिसमें देश भर में अनुसूचित जनजातियों की भूमि और पांचवीं व छठी अनुसूचियों के अंतर्गत आने वाली संपत्तियां, जो वक्फ बोर्डों को अवैध रूप से हस्तांतरित हो चुकी हैं, उन्हें वापस लौटाने के लिए प्रस्तावित न्यायाधिकरणों (Tribunals) को अधिकार दिए जाएं। इसके साथ ही, विधेयक के नियमों में इस प्रक्रिया की विस्तृत व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। यदि न्यायाधिकरण व्यवहार्य न हो, तो कोई अन्य समुचित प्रावधान (जैसे विशेष समिति या जांच आयोग) बनाया जाए।

 

इन संशोधनों की आवश्यकता इसलिए है, क्योंकि मौजूदा कानूनों के बावजूद वक्फ बोर्डों द्वारा जनजातीय भूमि पर अतिक्रमण हुआ है। यह स्थिति संवैधानिक प्रावधानों और जनजातीय अधिकारों का उल्लंघन करती है। प्रस्तावित प्रावधानों से निम्नलिखित परिणाम अपेक्षित हैं। जनजातीय भूमि वक्फ दावों से सुरक्षित रहेगी। ग्राम सभा की सहमति और सत्यापन से जनजातीय समुदाय सशक्त होंगे। अवैध दावों पर प्रभावी रोकथाम और दंड लागू होगा। ऐतिहासिक अन्याय को सुधारते हुए अवैध हस्तांतरित भूमि जनजातियों को लौटाई जाएगी। विधेयक संविधान और अंतरराष्ट्रीय संधियों (जैसे ILO कन्वेंशन 169) के अनुरूप होगा।

 

वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 में इन प्रावधानों को शामिल करना न केवल संवैधानिक दायित्व है, बल्कि जनजातीय समुदायों के प्रति न्याय सुनिश्चित करने का भी एक कदम है। जेपीसी की सिफारिशों, पेसा, एफआरए और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के आधार पर ये संशोधन विधेयक को मजबूत करेंगे और अनुसूचित जनजातियों की भूमि को स्थायी संरक्षण प्रदान करेंगे। साथ ही, अवैध हस्तांतरण की वापसी के लिए स्पष्ट प्रक्रिया से ऐतिहासिक गलतियों को ठीक किया जा सकेगा। इस महत्वपूर्ण विषय पर केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए कदमों के लिए सांसद गजेंद्र सिंह पटेल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मंत्रिमंडल का आभार व्यक्त किया है।

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