
श्री पार्श्वनाथ जैन मंदिर सराफा में 10 जून को 64 चँवर एवं भव्य चँदवा होगा समर्पण, पार्श्वनाथ विधान का आयोजन भी होगा
खंडवा। श्री पार्श्वनाथ पोरवाड़ दिगंबर जैन मंदिर सराफा में आगामी 10 जून को भगवान श्री 1008 पार्श्वनाथ के समक्ष 64 चँवर एवं भव्य चँदवा समर्पण का भव्य आयोजन किया जाएगा। इस अवसर पर पोरवाड़ युवा ओटला मंच, सराफा के तत्वावधान में श्रद्धा एवं भक्ति के साथ पार्श्वनाथ विधान का आयोजन भी संपन्न होगा।
पोरवाड़ दिगम्बर जैन समाज के मीडिया प्रभारी प्रेमांशु चौधरी ने बताया कि भगवान के समक्ष समर्पित किया जाने वाला यह आकर्षक एवं भव्य चँदवा जबलपुर स्थित प्रतिभास्थली की ब्रह्मचारिणी बहनों द्वारा तैयार किया गया है। इस चँदवे पर संपूर्ण जरदोजी कला का उत्कृष्ट कार्य किया गया है, जिसकी सुंदरता देखते ही बनती है। इसे तैयार करने में लगभग दो माह का समय लगा है।पोरवाड़ दिगम्बर ट्रस्ट मंडल की सहमति के बाद से इसे बनाने कार्य शुरू कर दिया गया था।
इस चँदवा निर्माण में विशेष रूप से विधि दीदी एवं उनकी सहयोगी ब्रह्मचारिणी बहनों ने समर्पण और परिश्रम के साथ कार्य किया है। प्रतिभास्थली, जबलपुर में ब्रह्मचारिणी बहनें धार्मिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा के साथ-साथ आत्मनिर्भरता की दिशा में भी उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं। चल चरखा योजना के अंतर्गत खादी वस्त्रों का निर्माण हथकरघा के माध्यम से किया जाता है तथा अन्य उपयोगी वस्तुओं का भी निर्माण किया जाता है। इन कार्यों से प्राप्त आय का उपयोग सेवा एवं जरूरतमंदों की सहायता में किया जाता है।
उल्लेखनीय है कि चँदवा समर्पण का संपूर्ण कार्य भी पोरवाड़ युवा ओटला मंच, सराफा के सदस्यों एवं दानदाताओं के सामूहिक सहयोग एवं सहभागिता से संपन्न हुआ है। समाजजनों ने इस धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहल की सराहना करते हुए इसे धर्म, सेवा और सामूहिक एकता का प्रेरणादायी उदाहरण बताया है।10 जून को होने वाले इस आयोजन को लेकर जैन समाज में विशेष उत्साह एवं श्रद्धा का वातावरण बना हुआ है।इस चंदेवा का शुक्रवार को श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में विधिवत अनवारण किया गया ,10 जून को मंदिर जी मे लगाया जाएगा।
“दिगम्बर जैन मंदिर के चंदेवा का महत्व”
प्रेमांशु चौधरी ने बताया कि दिगम्बर जैन मंदिर में मूर्ति के ऊपर लगे अलंकृत छत्र या मुकुट को चंदेवा (या छत्रत्रय) कहा जाता है इसके जैन मान्यता के हिसाब से बहुत महत्व हैं।
तीन लोकों का प्रतीक: चंदेवा मूलतः तीन छत्रों का समूह होता है, जो जैन धर्म में तीन लोकों (ऊर्ध्वलोक, मध्यलोक और अधोलोक) को दर्शाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि भगवान इन तीनों लोकों के स्वामी और नाथ हैं।
अतिशय/दिव्यता का बोध: शास्त्रों के अनुसार, जब किसी आत्मा को पूर्ण ज्ञान (केवलज्ञान) की प्राप्ति होती है, तो देवगण आकाश में रत्नों से जड़े तीन छत्रों की रचना करते हैं। यह भगवान के सर्वोच्च, वीतरागी और पूजनीय होने का प्रमाण है।”
त्रिरत्न की प्रेरणा: ये तीन छत्र जैन धर्म के मूल आधार—सम्यक् दर्शन,सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र (त्रिरत्न) का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।











