

आत्मा को शुद्ध करने के लिए पहले संपूर्ण पापों का प्रायश्चित होना चाहिए
बड़ौद. श्री आनंदचंद्र जैन आराधना भवन में परम पूज्य मुनिराज श्री प्रियदर्शनविजयजी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से बताया कि तीर्थंकर परमात्मा के जन्म के समय देवलोक से 64 इंद्र सहित समस्त देव एक करोड साठ लाख मिट्टी, चांदी, सोने, हिरों से बने कलशों से अभिषेक करते है. पूज्य श्री ने देवताओं के बारे में बताते हुवें कहाँ की चार प्रकार के देव रहते है, जिनमे से व्यंतर, भवनपति देव, जो की पृथ्वी पर निवास करते है, सूर्य, चंद्रमा, गृह आदि जो हमे दिखाई देते है एवं देवलोक में रहते है जो दिखाई नहीं देते. सामान्य से अच्छा, श्रेष्ठ धर्म आराधना करने वाला मनुष्य देवलोक में देव बनता है. पूज्य श्री ने बताया की शास्त्र में चार प्रकार के पाप बताये गये है, अतिक्रम जो मन मे आये, व्यतिक्रम जो जबान पर आये, अतिचार जो की तैयारी करे, अनाचार जो पूर्ण रुप से कर ही ले.
आत्मा को शुद्ध करने के लिए पहले संपूर्ण पापों का प्रायश्चित होना चाहिए, उपरांत तप, परमात्मा पूजन, परोपकार, श्रेष्ट भाव से की गयी आराधना के माध्यम से आत्मा शुद्ध बनती है. ट्रस्टी ललित जै. राजावत ने बताया की चेत्र माह की ओली आराधना पूज्य श्री प्रियदर्शनविजयजी महाराज साहेब के सानिध्य में 25 मार्च से प्रारंभ होगी. सभी धर्म आराधक उक्त तप आराधना करे.









