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*आदिवासी महापंचायत गढ़ा – मंडला के विकास खण्ड प्रबंध कार्यकारिणी – मोहगांव का गठन हुआ*

मंडला जिले की खास रिपोर्ट

आदिवासी महापंचायत गढ़ा – मंडला के विकास खण्ड प्रबंध कार्यकारिणी – मोहगांव का गठन हुआ

एडिटर इन्द्रमेन मार्को मंडला मध्यप्रदेश

मंडला। जिले के जनपद पंचायत मोहगांव अंतर्गत ग्राम पंचायत मोहगांव रैयत सभागार में आदिवासी महापंचायत गढ़ा – मंडला के विकास खण्ड मोहगांव की बैठक आयोजित की गई है, जिसमें निम्नलिखित विषयों पर विचार-विमर्श उपरान्त सर्व सहमति से निर्णय पारित किया गया।


*जो इस प्रकार है* आदिवासी महापंचायत गढ़ा मंडला के विकास खंड मोहगांव के लिये विकास खण्ड स्तरीय प्रबंध कार्यकारणी का सर्व सहमति से चयन कर गठन किया गया है, जैसे विकास खण्ड प्रबंध कार्यकारिणी अध्यक्ष- भारत सिंह मसराम, कार्यकारी अध्यक्ष- दशरथ सिंह वरकड़े, उपाध्यक्ष राधे शाह मरावी एवं मुनीम मरावी, सचिव-जयपाल मार्को, सह-सचिव- कोपा सिंह धुर्वे एवं राजेश नेताम, कोषाध्यक्ष- दसरू सिंह मरावी, प्रबंध कार्यकारिणी में सदस्यगण ब्रज कुमार मरकाम, फग्गन सिंह मरावी, कांशीराम कुलस्ते, राजा वरकड़े, देवेन्द्र मरावी, कमलेश धुर्वे, राम निवास रावत लाल कोर्चे, देवा सिंह करचाम का सर्वसम्मति से चयन किया गया है। इस दौरान निवास विधायक चैन सिंह वरकड़े, गुलाब सिंह मरदरिया, भूपेंद्र वरकड़े, मंगल सिंह करचाम, बचन सिंह मरावी, संतु सिंह मरावी, गत सिंह भवेदी, सी एस वरकड़े, आर पी मरावी, संजय शाह मरावी, डी एल उइके, राजेंद्र परते, बी एस मरावी, सोमवती धुर्वे सहित अन्य पदाधिकारी व सदस्य गण उपस्थित रहे। विशेष रूप से यह ध्यान आकर्षित कराना चाहते हैं कि भारतीय संविधान के विभिन्न अनुसूचियों, अनुच्छेदों एवं कानूनों में जनजाति समाज की सुरक्षा, संरक्षण एवं विकास के लिये अनेक प्रावधान/अधिकार/शक्तियाँ दिये गये हैं, उन सभी का जमीनी स्तर पर शत-प्रतिशत सही क्रियान्वयन सुनिश्चित कराने हेतु आदिवासी महापंचायत गढ़ा मंडला ने कदम आगे बढ़ाया है। जनजाति समाज के पुरखा-पूर्वजों की परम्परागत रूढ़िात सामाजिक पंचायती व्यवस्था को भारतीय संविधान पांचवी अनुसूची, अनुच्छेद 13(3)क एवं अनुच्छेद 244(2) में स्थान दिया गया है। गाँव पंचायत में मुकड़दम, दवान, कोटवार, दवार, छिरवय, पंचगण एवं अन्य पदाधिकारी होते हैं। गाँव पंचायत के पास विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों शक्तियों एक साथ उपलब्ध हैं। इसलिये कहा गया है न लोकसभा, न विधानसभा, सबसे बड़ा गाँव सभा अर्थात् जनजाति समाज के करोड़ों साल प्राचीन पारम्परिक रूढ़िगत गाँव पंचायत (मुकदमी पंचायत) एवं इससे संबंधित उच्च स्तर के सामाजिक पंचायतों को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों शक्तियाँ प्राप्त होने के कारण सबसे बड़ा है। भारतीय संविधान लागू होने के करोड़ों साल पूर्व से ही जनजाति समाज की पारम्परिक रूढ़िगत सामाजिक पंचायती व्यवस्था प्रचलन में था, जिसके माध्यम से सामाजिक स्व-शासन, प्रशासन एवं नियंत्रण व्यवस्था चलता था. आज यह मिटने की स्थिति में है. इस व्यवस्था के मिटने की स्थिति में जनजाति समाज के दशा और दिशा को बचाये रखने के लिये महाप्रलय/महासंकट की स्थिति का निर्माण हो गया है. यदि जनजाति समाज की सुरक्षा, संरक्षण एवं विकास के लिये संवैधानिक अधिकारों/ प्रावधानों को बचाने के लिये सामूहिक प्रयास नहीं किये गये तो जनजाति समाज को महाप्रलय के प्रभाव से नहीं बचा पाएंगे। जैसा कि पहला कारण देश की आजादी से लेकर अब तक जनजाति समाज के जनप्रतिनिधियों (पंच, सरपंच, जनपद पंचायत व जिला पंचायत सदस्य एवं अध्यक्ष, विधायक, सांसद एवं अन्य जनप्रतिनिधियों) के द्वारा अपने निर्वाचन क्षेत्र के अपने ही जनजाति समाज की सुरक्षा, संरक्षण एवं विकास हेतु बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित कराने हेतु प्रतिनिधित्व के अधिकार एवं कर्तव्यों का निर्वहन संबंधी व्यवहार ठीक नहीं है। अधिकतर जनजाति समाज के जनप्रतिनिधि अपने समुदाय को नजर अंदाज करके अपने से गये संबद्ध राजनैतिक पार्टी एवं उसके कार्यकर्ताओं के हित में ही कार्य करते देखे हैं। इस परिस्थिति को देखकर ही आदिवासी महापंचायत बनाया गया है। जैसा कि दूसरा कारण भारतीय संविधान में किये गये प्रावधानों के तहत जनसंख्या के अनुपात में सरकारी सेवाओं में जनजाति समाज के लोगों को सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व देकर शासकीय कार्यालयों में पदस्थ किया जाता है. ताकि जनजाति समाज का सहयोग किया जा सके, परन्तु प्रायः सरकारी। ऑफिसों में जनजाति समाज के कुछ अधिकारी-कर्मचारी अपने ही समाज के सदस्यों के साथ भ्रष्ट आचरण एवं असहयोग करते हुये देखे एवं पाये जाते हैं। जनजाति समाज के अधिकारी/कर्मचारियों द्वारा पे बैंक टू सोसायटी के तहत जनजाति समाज के लिये बेहतर सेवा व सहयोग सुनिश्चित कर प्रतिनिधित्व के अधिकार एवं कर्तव्यों का निर्वहन संबंधी व्यवहार ठीक नहीं रहता है।
जैसाकि तीसरा कारण – न्यायपालिका में जनजाति समाज का जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं है। जनजाति समाज का न्यायपालिका में पर्याप्त न्यायाधीश नहीं होने के कारण जनजाति समाज को प्राकृक्तिक/ नैसर्गिक न्याय नहीं मिल पा रहा है। प्रायः जनजाति समाज के साथ न्याय प्रक्रिया में भेदभाव होते हुये देखे जाते हैं विगत अनेक वर्षों से भारतीय संविधान के प्रावधानों/अधिकारों/शक्तियों के अनुसार जनजाति समाज के लिये सुरक्षा, संरक्षण एवं विकास के प्रति न्यायपालिका का न्याय प्रक्रिया संतोषप्रद नहीं है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर मंडला जिला के गाँव-गाँव जाकर मीटिंग आयोजित कर पुरखों के करोड़ों साल प्राचीन परम्परागत सामाजिक पंचायती व्यवस्था को सशक्त करने हेतु मुकड़दम, दवान, छिरवय, कोटवार एवं अन्य गाँव प्रमुखों को प्रशिक्षित को पुनः सक्रिय करने के लिये आदिवासी महापंचायत गढ़ा-मंडला का संवैधानिक प्रावधानों के तहत गठन किया गया है। आदिवासी/जनजाति सगा समाज के मातृशक्ति, पितृशक्ति, युवाशक्ति, मंडला जिले में कार्यरत समस्त जनजाति सामाजिक संगठनों एवं अधिकारी/कर्मचारियों से आग्रह है कि इस आदिवासी महापंचायत से जुड़कर आदिवासी/जनजाति सामाजिक एकता और ताकत को बढ़ाने में अपनी भूमिका सुनिश्चित करें ।

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