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क्या हम खबरों के बीच वास्तविकता खोज रहे है या वास्तविकता के बीच खबरें ?

"सुर्खियों का संतुलन" सच्चाई का सन्नाटा"

“सुर्खियों का संतुलन, सच्चाइयों का सन्नाटा”

लोकतंत्र में मीडिया का पहला दायित्व सूचना देना नहीं, बल्कि सार्वजनिक विवेक को जगाए रखना है। पर जब सुर्खियाँ सत्ता की प्राथमिकताओं का आईना बनने लगें और नागरिकों की वास्तविक पीड़ा हाशिए पर खिसक जाए, तब प्रश्न सिर्फ खबरों का नहीं, विमर्श के स्वास्थ्य का होता है।

दिन की शुरुआत जिन खबरों से होती है, वही हमारे समय की नैतिक दिशा तय करती हैं। एक ओर दुर्घटनाएँ, स्वास्थ्य और शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न; दूसरी ओर नीतियों और घोषणाओं का उत्सव। यह विरोधाभास अस्वाभाविक नहीं—समाचार का स्वभाव ही बहुविध है—पर असहज तब होता है जब चयन का पैटर्न स्पष्ट दिखने लगे।

मीडिया का संकट आज “क्या छपा?” से अधिक “क्या नहीं छपा?” में छिपा है। घटनाएँ घटती हैं, दावे किए जाते हैं, घोषणाएँ होती हैं—पर उनका अनुपात, संदर्भ और अनुवर्ती प्रश्न अक्सर गायब रहते हैं। लोकतांत्रिक प्रतिरोध को “साजिश” की भाषा में पैक कर देना आसान है; पर सत्ता से असुविधाजनक प्रश्न पूछना कठिन। यह कठिनाई यदि स्थायी प्रवृत्ति बन जाए, तो पत्रकारिता धीरे-धीरे सूचना-प्रबंधन का उपक्रम बन जाती है।

यहाँ मुद्दा किसी दल या विचारधारा का नहीं, संपादकीय साहस का है। मीडिया का काम सत्ता-विरोध नहीं, सत्ता-परीक्षण है। अगर घोषणाएँ प्रमुखता पाती हैं, तो उपलब्धियों और विफलताओं का तुलनात्मक विश्लेषण भी उतनी ही प्रमुखता का अधिकारी है। यदि सुरक्षा-नीति सुर्खी बनती है, तो उसके प्रभाव, चुनौतियों और पूर्व दावों का वस्तुनिष्ठ लेखा-जोखा भी आवश्यक है। यदि कानून-व्यवस्था पर कार्रवाई दिखती है, तो प्रक्रियात्मक न्याय और संस्थागत निरपेक्षता पर विमर्श भी अनिवार्य है।

लोकतंत्र में नैरेटिव का निर्माण स्वाभाविक है; पर जब नैरेटिव तथ्य पर हावी हो जाए, तब मीडिया अनजाने में सत्ता का विस्तार बन जाता है। नागरिक तब उपभोक्ता में बदल जाता है—वह सूचना नहीं, अनुभव का पैकेज प्राप्त करता है।

सबसे गंभीर प्रश्न यही है: “क्या हम खबरों के बीच वास्तविकता खोज रहे हैं, या वास्तविकता के बीच खबरें?”

पत्रकारिता का स्वर्णिम सिद्धांत सरल है—”संदेह में संतुलन, तथ्य में कठोरता”। सुर्खियाँ चमक सकती हैं, पर उनका मूल्य तभी है जब वे सन्नाटों को भी आवाज़ दें।

“जब मीडिया सुर्खियों का शोर बढ़ाता है, तो लोकतंत्र सच्चाइयों का सन्नाटा सुनने लगता है।”

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